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कोंडागांव के हिर्री-भुमका में अनोखा दशहरा: रावण दहन नहीं, किया जाता है वध;नाभि से निकले ‘अमृत’ का तिलक लगाते हैं ग्रामीण

 
 कोंडागांव। देशभर में विजयादशमी के अवसर पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले के हिर्री और भुमका गांव में दशहरा मनाने की परंपरा कुछ अलग है। यहां रावण के पुतले को जलाने के बजाय उसका वध किया जाता है। इतना ही नहीं, रावण की नाभि से निकलने वाले लाल गुलाल के घोल को अमृत का प्रतीक मानकर ग्रामीण तिलक लगाते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना करते हैं। स्थानीय आस्था और मान्यताओं से जुड़ी यह परंपरा चार दशक से भी अधिक समय से निभाई जा रही है।

 मिट्टी से तैयार किया जाता है रावण का पुतला

हिर्री और भुमका गांव में विजयादशमी के अवसर पर मिट्टी से रावण का पुतला तैयार किया जाता है। भुमका गांव के मूर्तिकार मोहन सिंह कुंवर लंबे समय से रावण का पुतला बनाने का कार्य कर रहे हैं। बताया जाता है कि शुरुआती दौर में रावण का सिर बनाने के लिए मिट्टी के मटके का इस्तेमाल किया जाता था। समय के साथ पुतला बनाने की प्रक्रिया में बदलाव आया, लेकिन गांव की यह परंपरा आज भी कायम है।

दशहरे के दिन गांव में उत्सव का माहौल रहता है। रामलीला के मंचन को देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पहुंचते हैं। भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का मंचन आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहता है।

 

 हिरदेश निषाद ने आयोजन के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि दशहरे के अवसर पर ग्रामीण मिल-जुलकर रामलीला का आयोजन करते हैं। इस दौरान भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध के प्रसंग का मंचन किया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

वहीं, ग्राम हिर्री के पटेल भारद्वाज वैध ने बताया कि गांव के सभी ग्रामवासी मिल-जुलकर दशहरे की परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं। ग्राम के देवी-देवताओं की अगुवाई के पश्चात रामलीला का मंचन होता है और इसके बाद रावण वध किया जाता है। उन्होंने बताया कि गांव में यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है और इसमें ग्रामवासियों की सामूहिक सहभागिता रहती है।
 रावण दहन के बजाय वध करने की परंपरा

इन गांवों में रावण दहन के स्थान पर उसके वध की रस्म निभाई जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि रामायण में भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध किए जाने का वर्णन है, इसलिए यहां भी उसी प्रसंग के अनुरूप रावण वध किया जाता है।

रामलीला के अंतिम चरण में भगवान श्रीराम रावण पर तीर चलाते हैं। तीर लगने के बाद राम की सेना के पात्र रावण के पुतले पर प्रहार करते हैं और इस तरह वध की रस्म पूरी की जाती है। ग्रामीणों के लिए यह दृश्य धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा विशेष अवसर होता है।

 रावण की नाभि से निकलने वाले लाल गुलाल का लगाते हैं तिलक 

हिर्री और भुमका गांव के दशहरे का सबसे खास पहलू रावण वध के बाद निभाई जाने वाली तिलक की रस्म है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम का तीर लगने के बाद रावण की नाभि से लाल गुलाल का घोल निकलता है, जिसे अमृत का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद ग्रामीण उस घोल का तिलक लगाते हैं।

ग्रामीण इसे शुभ मानते हुए परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगल की कामना करते हैं। इस रस्म को लेकर लोगों में खास उत्साह रहता है। यही अनूठी परंपरा इन गांवों के दशहरे को क्षेत्र में अलग पहचान दिलाती है।

 पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी ग्रामीणों ने बताई अपनी सोच

ग्राम हिर्री के पटेल भारद्वाज वैध के अनुसार, रावण दहन के बजाय वध की परंपरा निभाने के पीछे पर्यावरण को लेकर भी ग्रामीणों की सोच है। उनका कहना है कि रावण दहन से पर्यावरण प्रदूषित होता है और इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं। ऐसे में गांव में पुतले को जलाने के बजाय वध की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार, यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ आपसी एकता और सामूहिक सहभागिता का भी प्रतीक है। ग्रामवासी मिलकर इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

 बस्तर की सांस्कृतिक विविधता की अनूठी मिसाल

कोंडागांव जिले के हिर्री और भुमका गांव में मनाया जाने वाला दशहरा स्थानीय आस्था, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी पर रावण दहन किया जाता है, वहीं इन गांवों में रामलीला, रावण वध और लाल गुलाल के प्रतीकात्मक तिलक की रस्म के साथ पर्व मनाया जाता है।

बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के बीच हिर्री और भुमका गांव का यह दशहरा अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से यह परंपरा आज भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों तक इसे पहुंचाने का सिलसिला जारी है।

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