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बोराई सिविल अस्पताल में एक आरएमए और नॉर्सिंगऑफ़िसर की नियुक्ति,बदहाली पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा,धरने के बाद गांव पहुंचा स्वास्थ्य अमला


धमतरी/नगरी- वनांचल क्षेत्र के लिए संजीवनी बनने का सपना दिखाने वाला बोराई सिविल अस्पताल खुद बीमार है। पांच साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के लिए बोराई स्वास्थ्य केंद्र को 18 पदों के साथ सिविल अस्पताल में उन्नत किया था। उम्मीद थी कि अब 50-60 किमी दूर धमतरी-सिहावा नहीं भागना पड़ेगा लेकिन रविवार रात लिखमा निवासी दुलारसिंह की सड़क दुर्घटना ने सिविल अस्पताल के नाम पर चल रहे धोखे की पोल खोलकर रख दी। रात करीब 11 बजे घायल दुलारसिंह को परिजन बोराई सिविल अस्पताल लेकर पहुंचे। पर अस्पताल के गेट पर ताला लटका था। न इमरजेंसी सेवा, न डॉक्टर, न कोई स्टाफ। नियमानुसार सिविल अस्पताल को 24 घंटे खुला रहना चाहिए, लेकिन यहां रात में सिर्फ ऑन-कॉल व्यवस्था है। ग्रामीणों का आरोप है कि एकमात्र आरएमए की ड्यूटी रात 8 से सुबह 8 बजे तक है, मगर वे विश्रामपुरी में रहते हैं। मरीज आने पर फोन कर बुलाना पड़ता है। इधर अस्पताल में ताला व घायल को तड़पता देखकर ग्रामीणों का गुस्सा भड़क गया। रात के समय ही ग्रामीण धरने पर बैठ गये, वही उग्र आंदोलन की चेतावनी दी। स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। अधिकारियों ने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि सुबह खुद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी गांव पहुंचकर ग्रामीणों की समस्या सुनेंगे तथा व्यवस्था सुधारा जाएगा, काफी देर समझाइश के बाद ग्रामीणों ने धरना खत्म किया, वही घायल को इलाज के किए नगरी अस्पताल भेजा गया।

बोर्ड सिविल अस्पताल का लेकिन सुविधा पीएचसी से भी कम  
ग्रामीणों ने बताया कि बोराई सिविल अस्पताल में 18 स्वीकृत पदों के विरुद्ध एक भी स्थायी मेडिकल ऑफिसर नहीं है। पदस्थ डॉक्टर पीजी कोर्स के लिए चली गईं। पूरे अस्पताल में सिर्फ 1 आरएमए और स्टाफ नर्स हैं। दिन के समय अस्पताल प्रभारी डॉक्टरों के भरोसे चलता है। कभी सिहावा, कभी सांकरा तो कभी दुगली से डॉक्टर बुलाकर काम चलाया जाता है। ग्रामीण सोनराज वट्टी, माखन लाल सलाम, दुलारसिंह, खुमान सिंह, वीरेन्द्र यादव, जुगलकिशोर, लखन मरकाम, चंद्रप्रकाश नेताम और लिलेश्वर नेताम ने बताया कि बोराई सिविल अस्पताल का सिर्फ बोर्ड लगा है, अस्पताल में रात्रि में डॉक्टर नहीं रहते, दिन में भी रोजाना बदल-बदलकर डॉक्टर आने से परेशानी होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सांकरा में एक एमओ और 3 आरएमए पदस्थ हैं, जबकि सिविल अस्पताल बोराई में एमओ की कुर्सी पांच साल से खाली है। पहले नक्सल प्रभावित होने का बहाना दिया जाता था। अब पूरा धमतरी जिला नक्सलमुक्त हो चुका है, फिर भी स्टाफ क्वार्टर और सुविधाएं न होने से कोई डॉक्टर यहां रुकने को तैयार नहीं है। 
धरने के बाद हुई आरएमए व नर्सिंग ऑफिसर की पदस्थापना,मुख्यालय में ही रहने निर्देश
ग्रामीणों के धरने और हंगामे की सूचना प्रशासन हरकत में आया। सोमवार को सीएमएचओ डॉ. चंद्रकांत कौशिक, डीपीएम, बीएमओ, बीपीएम, एसडीओपी, टीआई, तहसीलदार, नायाब तहसीलदार समेत अन्य अधिकारी बोराई पहुंचे। चार पंचायतों के जनप्रतिनिधियों और सैकड़ों ग्रामीणों की मौजूदगी में अस्पताल के गेट के सामने ही बैठक हुई। बैठक में पूर्व जिला पंचायत सदस्य मनोज साक्षी और वीरेन्द्र यादव ने ग्रामीणों का पक्ष रखते हुए दो टूक कहा कि अब कोरे आश्वासन नहीं चलेंगे। 24 घंटे डॉक्टर चाहिए, स्थायी स्टाफ चाहिए। वनांचल के लोगों को भी सम्मान से इलाज का हक है। ग्रामीणों के दबाव के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल बोराई सिविल अस्पताल में एक नए आरएमए और एक नर्सिंग ऑफिसर की पदस्थापना का आदेश जारी कर दिया। साथ ही दो स्टाफ नर्स की जल्द नियुक्ति का लिखित आश्वासन भी दिया गया। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि अस्पताल की एक स्टाफ नर्स तीन दिन की छुट्टी पर है, जिसकी अनुपस्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था की गई है ताकि सेवाएं बाधित न हों। वहीं ग्रामीणों की मांग पर बोराई बाजार वाले दिन एक अतिरिक्त डॉक्टर की ड्यूटी लगाने और फार्मासिस्ट नहीं होने पर दवाईयों का वितरण नर्सिंग ऑफिसर की उपस्थिति में करने पर सहमति बनी। सीएमएचओ ने अस्पताल स्टाफ को मुख्यालय में ही रहने का सख्त निर्देश भी जारी किया है।


अब नहीं सुधरे हालात तो सुशासन तिहार का करेंगे बहिष्कार
बैठक में ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि बोराई सिविल अस्पताल की व्यवस्था स्थायी रूप से नहीं सुधरी तो बोराई, घुटकेल, मैनपुर और लिखमा पंचायत के ग्रामीण सुशासन तिहार का बहिष्कार करेंगे। ग्रामीणों का कहना है कि अस्पताल की बदहाली को लेकर पहले भी चक्काजाम कर चुके हैं। हर बार आश्वासन मिलता है, पर जमीन पर कुछ नहीं बदलता। ग्रामीणों का कहना है कि अब वे और इंतजार नहीं कर सकते। एक सड़क हादसे ने बता दिया कि रात में बीमार पड़ना यहां गुनाह है। नए स्टाफ की पोस्टिंग से थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन अगर पहले की तरह व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटी तो सुशासन तिहार का बहिष्कार करने के साथ ही फिर आंदोलन का रास्ता चुना जाएगा।

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