ग्रामीण पूछ रहे सवाल—जब पर्यटन विकास के लिए रास्ते निकल सकते हैं, तो हमारी मूलभूत सुविधाओं के लिए नियमों का हवाला क्यों?
धमतरी
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों के लिए विकास आज भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। सड़क, बिजली, पेयजल, पुल-पुलिया, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की मांग लेकर जब ग्रामीण प्रशासन के सामने पहुंचते हैं, तो उन्हें वन संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरणीय नियम और टाइगर रिजर्व से जुड़े प्रावधानों का हवाला दिया जाता है।
ग्रामीणों का सवाल है—क्या संरक्षण के ये नियम केवल स्थानीय जनता की जरूरतों और विकास कार्यों पर लागू होते हैं, या पर्यटन गतिविधियों पर भी समान रूप से लागू होते हैं?
नियमों में पर्यटन भी शामिल
उदंती-सीतानदी क्षेत्र से संबंधित इको-सेंसिटिव जोन अधिसूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इको-सेंसिटिव जोन में पर्यटन गतिविधियां निर्धारित इको-टूरिज्म महायोजना के अनुसार होंगी। यह महायोजना पर्यटन विभाग द्वारा वन एवं पर्यावरण विभाग के परामर्श से तैयार की जानी है। साथ ही नए पर्यटन कार्यों और मौजूदा पर्यटन गतिविधियों के विस्तार को निर्धारित पर्यावरण एवं वन्यजीव संबंधी दिशानिर्देशों के अनुसार विनियमित किया जाना है।
अर्थात नियम पर्यटन पर भी लागू हैं
यहीं से ग्रामीणों का सवाल और गंभीर हो जाता है—यदि नियमों के बावजूद पर्यटन गतिविधियों के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत विकास संभव है, तो स्थानीय ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतों के लिए भी उसी पारदर्शी प्रक्रिया के तहत रास्ता क्यों नहीं निकाला जाता?
2026-27 के बजट ने बढ़ाया सवाल
छत्तीसगढ़ सरकार के 2026-27 के परिणामी बजट में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अंतर्गत नैसर्गिक पर्यटन विकास के लिए ₹90 करोड़ का प्रावधान है। इसमें पर्यटन स्थलों पर चबूतरा, पगोडा, एनीकट, फेंसिंग, कॉटेज, सीढ़ी, वनमार्ग उन्नयन, रास्ता निर्माण और प्रचार-प्रसार जैसे कार्य शामिल हैं।
इसी बजट में प्रोजेक्ट टाइगर के लिए ₹175 करोड़ का प्रावधान है, जिसके अंतर्गत इन्द्रावती, उदंती-सीतानदी और अचानकमार टाइगर रिजर्व में रास्ता/कैल्वर्ट, चेकडैम, तालाब, वनमार्ग मरम्मत, निरीक्षण कुटीर सहित विभिन्न कार्यों का उल्लेख है।
ऐसे में क्षेत्र के ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब टाइगर रिजर्व क्षेत्र में नियमों के दायरे में रास्ते, पर्यटन सुविधाएं और अन्य निर्माण कार्य किए जा सकते हैं, तो स्थानीय बस्तियों की जरूरी सुविधाओं के लिए समाधान का रास्ता क्यों नहीं खोजा जाता?
संरक्षण जरूरी, लेकिन इंसान भी जरूरी
इको-सेंसिटिव जोन की व्यवस्था का उद्देश्य विकास को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील गतिविधियों को विनियमित करना है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय भी स्पष्ट करता है कि ESZ में स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए विकासात्मक गतिविधियों को स्थायी तरीके से विनियमित किया जाना चाहिए।
इसलिए ग्रामीणों की मांग को केवल “विकास बनाम जंगल” के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
असल सवाल है—
क्या संरक्षण के साथ स्थानीय जनता के लिए सम्मानजनक जीवन, सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की व्यवस्था का संतुलित मॉडल बनाया जा सकता है?
पर्यटन का लाभ किसे?
अगर टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा दिया जाता है तो एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—पर्यटन से पैदा होने वाले रोजगार और आर्थिक अवसरों में स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी कितनी होगी?
क्या स्थानीय युवाओं को गाइड, होम-स्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद, खान-पान और अन्य सेवाओं में अवसर मिलेंगे?
क्या ग्रामसभा और स्थानीय समुदायों को पर्यटन योजना में वास्तविक भागीदारी मिलेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या जिस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा देखने के लिए पर्यटक आएंगे, उसी क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों को भी उस विकास का लाभ मिलेगा?
ग्रामीणों की मांग—नियम हटाओ नहीं, समान नियम लागू करो
ग्रामीणों की मांग नियमों को समाप्त करने की नहीं है। मांग यह है कि नियम सभी के लिए समान हों।
यदि किसी सड़क, भवन या मूलभूत सुविधा के लिए पर्यावरणीय या वन्यजीव संबंधी अनुमति आवश्यक है तो वह प्रक्रिया अपनाई जाए। लेकिन पर्यटन के लिए भी वही प्रक्रिया, वही पारदर्शिता और वही जवाबदेही हो।
प्रशासन सार्वजनिक करे—
- पर्यटन क्षेत्र में कौन-कौन से कार्य स्वीकृत हैं?
- किन कार्यों के लिए कौन-कौन सी अनुमति ली गई?
- इको-टूरिज्म महायोजना में उदंती-सीतानदी क्षेत्र के कौन से स्थान शामिल हैं?
- स्थानीय ग्रामसभा एवं ग्रामीणों से क्या परामर्श लिया गया?
- पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार देने की क्या व्यवस्था है?
- ग्रामीणों के मूलभूत विकास कार्यों में किन नियमों के कारण अड़चन है?
- उन्हीं नियमों के तहत पर्यटन कार्यों को किस प्रक्रिया से अनुमति दी गई?
आखिर कब बदलेगी यह दास्तां?
उदंती-सीतानदी के जंगल और वन्यजीव देश की प्राकृतिक धरोहर हैं। उनकी रक्षा जरूरी है। लेकिन इस प्राकृतिक धरोहर के बीच पीढ़ियों से रहने वाले लोगों के अधिकार और बुनियादी जरूरतें भी नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं।
आज क्षेत्र का ग्रामीण एक सीधा सवाल पूछ रहा है—
“हम विकास मांगते हैं तो नियम-कानून सामने आ जाते हैं, लेकिन पर्यटन विकास की बात आती है तो उन्हीं नियमों के बीच रास्ता कैसे निकल जाता है?”
यह सवाल किसी विभाग के विरोध का नहीं, बल्कि समान नियम, पारदर्शिता और स्थानीय भागीदारी का है।
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